परिचय (Introduction):
Tithi of Srimanta Sankardeva असम और उत्तर-पूर्व भारत में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। श्रीमंत शंकरदेव न केवल एक संत और दार्शनिक थे, बल्कि एक महान समाज सुधारक, कवि, नाटककार और कलाकार भी थे। उन्होंने असमिया समाज में नववैष्णव भक्ति आंदोलन (Neo-Vaishnavism Movement) की शुरुआत की और ‘Ek Sarana Naam Dharma’ का प्रचार किया। इस लेख में, हम उनके जीवन, शिक्षाओं, और उनकी पुण्यतिथि (Tithi of Srimanta Sankardeva) को किस प्रकार मनाया जाता है, इस पर विस्तृत चर्चा करेंगे।
Srimanta Sankardeva का जन्म 1449 ईस्वी में असम के नागांव जिले में हुआ था। वे एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे और प्रारंभिक अवस्था से ही धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे।
जन्म तिथि: 1449 ईस्वी (Tithi of Srimanta Sankardeva)
जन्म स्थान: अलीपुखुरी, नागांव, असम।
धार्मिक परंपरा: नववैष्णव भक्ति आंदोलन (Neo-Vaishnavism Movement)
मृत्यु तिथि: 1568 ईस्वी।
मुख्य कार्य: धार्मिक सुधार, साहित्य, संगीत, कला और नाट्य कला का प्रसार।
शंकरदेव ने भारत में वैष्णव धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया और भक्ति आंदोलन (Bhakti Movement) को असम में मजबूत किया। उन्होंने अपनी शिक्षाओं में एकेश्वरवाद (Monotheism) और ‘Ek Sarana Naam Dharma’ का प्रचार किया, जिसका अर्थ है केवल एक ईश्वर की आराधना।
श्रीमंत शंकरदेव की पुण्यतिथि (Tithi of Srimanta Sankardeva) का महत्व (Importance of death anniversary of Srimanta Sankardeva):
हर साल, Tithi of Srimanta Sankardeva भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष के दौरान मनाई जाती है। यह तिथि पूरे असम और पूर्वोत्तर भारत में वैष्णव अनुयायियों द्वारा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन असम के विभिन्न भागों में धार्मिक कार्यक्रमों, प्रवचनों और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है।
Tithi of Srimanta Sankardeva क्यों महत्वपूर्ण है? (Why is the Tithi of Srimanta Sankardeva important?):
1. धार्मिक महत्व: यह दिन उनके अनुयायियों के लिए भक्ति, सेवा और सत्संग का प्रतीक है।
2. सांस्कृतिक प्रभाव: उनकी शिक्षाओं ने असमिया संस्कृति, साहित्य और कला को समृद्ध किया।
3. सामाजिक सुधार: उन्होंने जातिप्रथा और सामाजिक असमानता के विरुद्ध आवाज उठाई।
4. Ek Sarana Naam Dharma: इस पंथ के अनुयायी इस दिन भजन-कीर्तन और सामूहिक प्रार्थनाओं का आयोजन करते हैं।
श्रीमंत शंकरदेव के प्रमुख योगदान (Major Contributions of Srimanta Sankardev):
1. नववैष्णव भक्ति आंदोलन (Neo-Vaishnavism Movement):
शंकरदेव ने असम में भक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया और वैष्णव परंपरा को एक नई दिशा दी। उन्होंने मूर्ति पूजा के स्थान पर ‘नाम-संकीर्तन’ (Naam Sankirtan) को बढ़ावा दिया।
2. साहित्य और संगीत (Literature and music):
Borgeet: श्रीमंत शंकरदेव ने अनेक भक्ति गीत (Borgeet) लिखे, जो आज भी असम के धार्मिक समारोहों में गाए जाते हैं।
Kirtan Ghosa: यह उनकी रचनाओं का संकलन है, जिसमें भक्ति और ज्ञान की बातें शामिल हैं।
Ankiya Naat: उन्होंने नाट्य रूप में धार्मिक शिक्षाओं को प्रस्तुत करने के लिए ‘Ankiya Naat’ की शुरुआत की।
3. सामाजिक सुधार और एकता का संदेश (Message of social reform and unity):
उन्होंने जाति और धर्म की बाधाओं को तोड़कर सभी को एक समान स्थान दिया।
उन्होंने वैष्णव धर्म के भीतर सामूहिक पूजा और नाम-गान को बढ़ावा दिया।
‘Sattra’ (वैष्णव मठ) स्थापित किए, जो उनके अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक केंद्र बने।
Tithi of Srimanta Sankardeva का उत्सव (Celebration of Tithi of Srimanta Sankardeva):
1. Satra और Namghar में भजन-कीर्तन।
2. Borgeet और Kirtan Ghosha का पाठ।
3. Ankiya Naat (धार्मिक नाटकों) का मंचन।
4. सामूहिक भोज (प्रसाद वितरण)।
5. संत शंकरदेव की शिक्षाओं पर व्याख्यान।
निष्कर्ष (Conclusion):
Tithi of Srimanta Sankardeva केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह दिन हमें उनकी शिक्षाओं, समाज सुधार और वैष्णव भक्ति आंदोलन की महानता की याद दिलाता है। यदि आप असम की संस्कृति और इतिहास से जुड़े हैं, तो इस दिन को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाना आवश्यक है।